देश में मोबाइल रिचार्ज प्लान को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
राज्यसभा में आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद राघव चड्ढा ने टेलीकॉम कंपनियों के प्रीपेड रिचार्ज प्लान पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा सिस्टम आम लोगों के लिए नुकसानदायक है। उन्होंने कहा कि मोबाइल कंपनियां 28 दिन की वैलिडिटी वाले प्लान देती हैं, जिसकी वजह से यूजर्स को साल में 12 नहीं बल्कि 13 बार रिचार्ज करना पड़ता है।
28 दिन वाला प्लान क्यों बना विवाद
भारत में ज्यादातर प्रीपेड मोबाइल प्लान 28 दिन की वैलिडिटी के साथ आते हैं। अगर इसका हिसाब लगाया जाए तो 28 दिन × 13 रिचार्ज = 364 दिन होते हैं। यानी पूरे साल मोबाइल चालू रखने के लिए यूजर को 13 बार रिचार्ज करना पड़ता है। राघव चड्ढा का कहना है कि अगर प्लान को “मंथली प्लान” कहा जाता है तो उसकी वैलिडिटी 30 या 31 दिन होनी चाहिए। 28 दिन का प्लान होने से कंपनियों को साल में एक अतिरिक्त रिचार्ज का फायदा मिलता है, जिससे उनकी कमाई बढ़ जाती है।
रिचार्ज खत्म होते ही इनकमिंग कॉल क्यों बंद हो जाती है?
संसद में उन्होंने एक और अहम मुद्दा उठाया। उनका कहना है कि रिचार्ज खत्म होने पर आउटगोइंग कॉल बंद होना समझ में आता है, लेकिन कई बार कंपनियां इनकमिंग कॉल भी बंद कर देती हैं। उन्होंने कहा कि आज के समय में मोबाइल नंबर बैंकिंग, OTP, सरकारी सेवाओं और नौकरी से जुड़े कॉल के लिए जरूरी हो गया है। ऐसे में अगर इनकमिंग कॉल भी बंद हो जाए तो लोगों को काफी परेशानी होती है।
टेलीकॉम कंपनियां 28 दिन का प्लान क्यों देती हैं
टेलीकॉम कंपनियों का कहना है कि 28 दिन का प्लान चार हफ्तों के बराबर होता है, इसलिए इससे उनके बिलिंग सिस्टम को मैनेज करना आसान होता है। हालांकि कई यूजर्स और एक्सपर्ट्स का मानना है कि इससे कंपनियों को साल में एक अतिरिक्त रिचार्ज का फायदा मिलता है। भारत में टेलीकॉम सेक्टर को टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) रेगुलेट करती है। नियमों के मुताबिक कंपनियों को कम से कम एक ऐसा प्लान देना जरूरी है जिसकी वैलिडिटी 30 दिन या उससे ज्यादा हो, लेकिन 28 दिन वाले प्लान पर कोई रोक नहीं है।
राघव चड्ढा का सुझाव
राघव चड्ढा ने सरकार और टेलीकॉम कंपनियों से मांग की है कि रिचार्ज प्लान को ज्यादा पारदर्शी और उपभोक्ता हित में बनाया जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि मोबाइल रिचार्ज की वैलिडिटी कैलेंडर महीने यानी 30 या 31 दिन के हिसाब से होनी चाहिए, ताकि यूजर्स को साल में अतिरिक्त रिचार्ज न करना पड़े। फिलहाल इस मुद्दे पर सोशल मीडिया और टेक जगत में बहस तेज हो गई है। कुछ लोग इसे कंपनियों की रणनीति बता रहे हैं, जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे बिलिंग सिस्टम से जुड़ा मॉडल मानते हैं।