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Telegram ने सरकार के फैसले को कोर्ट में दी चुनौती, जानें क्या कहता है कानून

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नीट-यूजी एग्जाम के कारण केंद्र ने अस्थायी तौर पर टेलीग्राम पर रोक लगाई.

टेलीग्राम ने केंद्र सरकार को कोर्ट में चुनौती दी है.भारत सरकार ने नीट-यूजी एग्जाम से पूर्व एक सप्ताह के लिए देश में सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म टेलीग्राम पर अस्थाई रोक लगाई थी. पेपर आउट होने के बाद नीट-यूजी दोबारा कराई जा रही है. यह परीक्षा आगामी 21 जून को होगी और रोक 22 जून तक लगाई गई है. यह सूचना सार्वजनिक होने के साथ ही लोग सवाल उठाया रहे हैं. टेलीग्राम ने भी सवाल उठाया है. उनका कहना है कि ऐसे अनेक प्लेटफ़ॉर्म हैं जहां से इस तरह की चीजें शेयर करना संभव है, तो रोक अकेले टेलीग्राम पर क्यों?
टेलीग्राम ऐप के फाउंडर और CEO पावेल ड्यूरोव ने गंभीर आरोप लगाए हैं. उनका दावा है कि टेलीकॉम कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज, हमारे ऐप की इंटरनेट कनेक्टिविटी में दखल दे रही है. यह सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, कई देशों में यूजर्स को इसका असर झेलना पड़ रहा है. आइए, इसी बहाने जानते हैं कि क्या सरकार किसी ऐप को भारत में बंद कैसे और किस कानून के तहत बंद कर सकती है? क्या है इसका पूरा प्रॉसेस?
सरकार किस कानून के तहत ऐप ब्लॉक कर सकती है?
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे कहते हैं कि भारत में किसी वेबसाइट, ऐप या ऑनलाइन कंटेंट को ब्लॉक करने का मुख्य कानून सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 है. इसे आम भाषा में आईटी एक्ट कहा जाता है. इस कानून की धारा 69ए सरकार को ऑनलाइन कंटेंट या प्लेटफॉर्म तक पहुंच रोकने की शक्ति देती है. इसके तहत केंद्र सरकार किसी वेबसाइट, ऐप, लिंक, चैनल या ऑनलाइन सूचना को ब्लॉक करने का आदेश दे सकती है. लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है. सरकार को इसका इस्तेमाल तय कानूनी आधारों पर ही करना होता है.
Telegram Founder And Ceo Durov

टेलीग्राम ऐप के फाउंडर और CEO पावेल ड्यूरोव

धारा 69ए क्या कहती है?
आईटी एक्ट की धारा 69ए के तहत सरकार तब ऑनलाइन कंटेंट या ऐप को ब्लॉक कर सकती है, जब उसे लगे कि ऐसा करना जरूरी है. यह कदम भारत की संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए, देश की सुरक्षा के लिए, अन्य देशों से अच्छे संबंध बनाए रखने के लिए, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए एवं किसी अपराध को उकसाने से रोकने आदि के लिए उठाया जाता है. नीट-यूजी जैसे मामले में सरकार आमतौर पर सार्वजनिक व्यवस्था, परीक्षा की निष्पक्षता और धोखाधड़ी रोकने जैसे आधारों का हवाला दे सकती है. अगर किसी ऐप पर फर्जी पेपर लीक, ठगी या नकल गिरोह सक्रिय हों, तो सरकार कार्रवाई कर सकती है.
ब्लॉकिंग रूल्स 2009 की भूमिका
इसके लिए सिर्फ आईटी एक्ट ही काफी नहीं है. इसके लिए आईटी रूल्स 2009 के तहत की मदद भी ली जाती है. ब्लॉकिंग रूल्स में बताया गया है कि सरकार ब्लॉकिंग का आदेश कैसे देगी? कौन अधिकारी आदेश देगा? किस स्तर पर जांच होगी और आदेश की समीक्षा कैसे होगी?
एडवोकेट दुबे कहते हैं कि इसके तहत जब अफसर या संबंधित एजेंसियां किसी ऐप को देश की सुरक्षा, कानून व्यवस्था या संगठित धोखाधड़ी के लिए खतरा मानते हैं, तो वे इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को औपचारिक सिफारिश भेजते हैं. इसके बाद एक अंतर-मंत्रालयी समिति आरोपों की जांच करती है. यदि समिति संतुष्ट हो जाती है कि ऐप या वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी देश के खिलाफ या कानून के दायरे से बाहर है, तो वह आईटी सचिव की मंजूरी के साथ ब्लॉकिंग आदेश जारी करती है.
Indian Law On It

टेलीग्राम पर अस्थायी रोक लगाई गई है.

आपात स्थिति में क्या होता है?

कई बार मामला बहुत जरूरी होता है. जैसे दंगा, आतंकवाद, परीक्षा लीक, साइबर धोखाधड़ी या राष्ट्रीय सुरक्षा का खतरा. ऐसी स्थिति में सरकार तत्काल अंतरिम ब्लॉकिंग आदेश जारी कर सकती है. इसे इमरजेंसी ब्लॉकिंग कहा जाता है, लेकिन बाद में इस आदेश की समीक्षा जरूरी होती है. सरकार को यह देखना पड़ता है कि आदेश सही था या नहीं. इसलिए आपात आदेश भी हमेशा के लिए नहीं होता. उसे कानूनी कसौटी पर परखा जा सकता है.

क्या पूरा ऐप बंद करना जरूरी होता है?

यह सबसे बड़ा कानूनी सवाल है. कानून में इसे अनुपातिकता का सिद्धांत कहा जाता है. इसका मतलब है कि सरकारी कदम खतरे के हिसाब से होना चाहिए. अगर समस्या कुछ चैनलों तक सीमित है, तो पहले उन चैनलों पर कार्रवाई होनी चाहिए. अगर समस्या बहुत व्यापक है और प्लेटफॉर्म सहयोग नहीं कर रहा, तो बड़ा कदम उठाया जा सकता है. पूरे ऐप को बंद करना गंभीर कदम माना जाता है. इससे लाखों सामान्य यूजर्स भी प्रभावित होते हैं.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल

भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है. लोग ऐप के जरिए बातचीत करते हैं. जानकारी साझा करते हैं. पढ़ाई करते हैं. व्यापार करते हैं. जब कोई ऐप बंद होता है, तो इस अधिकार पर असर पड़ता है. लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है. अनुच्छेद 19(2) के तहत सरकार उचित प्रतिबंध लगा सकती है. ऐसे प्रतिबंध सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा, अपराध रोकने और देश हित जैसे आधारों पर लगाए जा सकते हैं. फिर भी प्रतिबंध उचित, जरूरी और सीमित होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट की नजर में धारा 69ए क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने श्रेया सिंघल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में धारा 69ए को वैध माना था. कोर्ट ने कहा था कि इसमें प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय मौजूद हैं. लेकिन कोर्ट ने यह भी माना कि ब्लॉकिंग आदेश मनमाना नहीं हो सकता. सरकार को कानूनी आधार और प्रक्रिया का पालन करना होगा, यानी धारा 69ए सरकार को शक्ति तो देती है लेकिन यह शक्ति जवाबदेही के साथ आती है.

नीट मामले में सरकार की दलील क्या हो सकती है?

नीट में 22 लाख छात्र एनरोल हैं. पेपर लीक की अफवाह छात्रों को नुकसान पहुंचाती है. फर्जी प्रश्नपत्र बेचने वाले गिरोह छात्रों और अभिभावकों से पैसा ऐंठ सकते हैं. सरकार यह भी कह सकती है कि रोक अस्थायी है यानी यह स्थायी बैन नहीं है. इसका उद्देश्य परीक्षा अवधि में धोखाधड़ी रोकना है.
सरल शब्दों में कहें तो भारत में सरकार किसी ऐप को बंद कर सकती है, लेकिन यह काम कानून और प्रक्रिया के तहत ही होना चाहिए. आईटी एक्ट की धारा 69ए और ब्लॉकिंग रूल्स 2009 इस मामले में सरकार को अधिकार देते हैं. टेलीग्राम पर अस्थायी रोक का मामला परीक्षा सुरक्षा और डिजिटल स्वतंत्रता के बीच संतुलन का उदाहरण है. सरकार का लक्ष्य अगर पेपर लीक और ठगी रोकना है, तो वह वैध हो सकता है. डिजिटल युग में सुरक्षा भी जरूरी है. नागरिक अधिकार भी जरूरी हैं. सही रास्ता वही है, जहां दोनों के बीच संतुलन बना रहे.

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